Thursday, August 2, 2012

सरोज-स्मृति : निराला - व्याख्या जैसा कुछ


देखा विवाह आमूल नवल, तुझ पर शुभ पडा़ कलश का जल। देखती मुझे तू हँसी मन्द, होंठो में बिजली फँसी स्पन्द उर में भर झूली छवि सुन्दर, प्रिय की अशब्द श्रृंगार-मुखर तू खुली एक उच्छवास संग, विश्वास-स्तब्ध बँध अंग-अंग, नत नयनों से आलोक उतर काँपा अधरों पर थर-थर-थर। देखा मैनें वह मूर्ति-धीति मेरे वसन्त की प्रथम गीति -- श्रृंगार, रहा जो निराकार, रस कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग -- भरता प्राणों में राग-रंग, रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना मही। हो गया ब्याह आत्मीय स्वजन कोई थे नहीं, न आमन्त्रण था भेजा गया, विवाह-राग भर रहा न घर निशि-दिवस जाग; प्रिय मौन एक संगीत भरा नव जीवन के स्वर पर उतरा।



इस काव्यांश  में निराला ने अपनी पुत्री सरोज के विवाह का वर्णन किया है.
‘आमूल’ का अर्थ ‘रेडिकल’ के ज्यादा नज़दीक है. नवल भी उसी नवाचार की प्रतिष्ठा करता है.  निराला ने अपनी पुत्री के विवाह में किसी वेदपाठी ब्राह्मण को नहीं बुलाया. ना तो जन्म-कुंडली मिलवाई. निराला वैसे भी बदनाम थे अपने समाज में. “ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत”.  कोई पंडित राज़ी नहीं था सरोज की शादी के लिए. तो निराला ने निर्णय लिया कि वह स्वयं ये ज़िम्मेदारी उठाएंगे. वे लिखते हैं - “ लग्न के पढूंगा स्वयं मन्त्र , यदि पंडित जी होंगे स्वतंत्र”.
सबसे बड़ी बात , शायद भारतीय भाषाओं के किसी भी साहित्य में किसी पिता ने अपनी पुत्री के सौंदर्य की तुलना अपनी पत्नी के सौंदर्य से नहीं की थी. ना कालिदास ने , ना व्यास ने , ना वाल्मीकि ने ,  ना भवभूति ने , ना कम्ब ने , ना वाणभट्ट आदि ने . यह काम शायद निराला को ही करना था.
सरोज की सुहागन वाली छवि निराला को बार बार मनोहर देवी की याद दिलाती है. जब कलश के जल से वधू को स्नान कराया गया , तो निराला को अपनी प्रिया यानी मनोहरा देवी की सबसे ज्यादा याद आई. क्यों ? क्योंकि यह काम परंपरागत रूप से लड़की की माँ ही करती है.  जब सरोज ने इस अवसर पर अपने पिता की तरफ हँसते हुए देखा तो अकस्मात ही निराला के ह्रदय में अपनी पत्नी की छवि उभर आई.
‘प्रिय की अशब्द श्रृंगार मुखर...” का अर्थ है कि मानो मनोहरा देवी का सौंदर्य ही सरोज के सहज उच्छ्वास के साथ साकार हो उठा हो . सरोज के अंग अंग से मनोहरा की कान्ति फूट रही है , यह इतना सहज है कि दोनों एकाकार हो उठे हैं. सरोज के अंग अंग से जो कान्ति निकल रही है , वह लगातार कवि को अपनी प्रियतमा की याद दिला रही है.
कवि एक फ्लैशबैक में चला जाता है. उसे अपनी प्रियतमा के संग बिताए गए क्षण याद आने लगते हैं. निराला को मनोहरा देवी का सौंदर्य और उनका मधुर गला याद आने लगता है. वो गीत जो उन्होंने अपनी पत्नी से सीखा था – “श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन हरण भव भय दारुणं”जिसने उनके प्राणों में नया उत्साह भर दिया था . ( ‘निराला की साहित्य साधना -१ : राम विलास शर्मा )

कवि कहता है कि सरोज का रूप देखकर ऐसा लगता है कि मानो कामदेव ने वही रूप आज मेरी बेटी को दे दिया है. “आकाश बदल कर बना मही”में ये ध्वनि है कि अगर मनोहरा का सौंदर्य आकाशधर्मा था , तो सरोज का सौंदर्य वसुधा-धर्मी. अर्थात मनोहरा में कल्पना की प्रधानता थे और सरोज में यथार्थ की.

बाकी पंक्तियाँ साधारण ही हैं. उसमें खास ये हैं कि निराला ने जो विवाह सरोज का किया , उसमें किसी रिश्तेदार आदि को न बुलाकर केवल आत्मीय स्वजनों को बुलाया. इसका विवरण भी ‘निराला की साहित्य साधना -१’ में दिया गया है.
अंतिम पंक्तियों में निराला लिखते हैं कि जिस घर में कुछ दिनों से दिन रात ‘विवाह राग’ बज रहा था , अचानक वह सूना हो गया . सूना भी वैसा नहीं, एक मौन संगीत जैसे कहीं बज रहा हो, और एक नए जीवन का स्वागत कर रहा हो .  आचार्य शुक्ल ने तो लिखा ही है कि – “कविता को संगीत के और संगीत को कविता के निकट लाने का जैसा प्रयास निराला ने किया है , वैसा किसी आधुनिक  हिंदी के कवि ने नहीं किया.” ( हिंदी साहित्य का इतिहास)